karun ras ka udaharan - करुण रस का उदाहरण
करुण रस का उदाहरण - karun ras ke udaharan
easy examples of karun ras in hindi
सूरदास (सुदामा चरित)
“देखि सुदामा की दीन दशा,
करुणा करि करुणानिधि रोए,
पानी परात को हाथ छुयो नहिं,
नैनन के जल से पग धोए।”
व्याख्या: इस प्रसंग में भगवान कृष्ण अपने मित्र सुदामा की अत्यंत दयनीय स्थिति (गरीबी और दुःख) को देखकर भावुक हो जाते हैं। सुदामा की फटी-पुरानी अवस्था देखकर कृष्ण की आँखों में आँसू आ जाते हैं और वे उनके पैर अपने आँसुओं से धोते हैं। यह दृश्य अत्यधिक करुणा, दया और भावुकता से भरा हुआ है। 👉 इसलिए यहाँ करुण रस का उत्कृष्ट और सबसे प्रसिद्ध उदाहरण मिलता है।
कबीर
“दुख में सुमिरन सब करें,
सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करे,
तो दुख काहे को होय।”
व्याख्या: कबीर जी यहाँ मनुष्य की प्रवृत्ति को बताते हैं कि वह दुख में ही भगवान को याद करता है। “दुख” की स्थिति करुण रस को जन्म देती है और मनुष्य की असहायता को दर्शाती है।
रहीम
“रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।”
करुण रस के 20 उदाहरण
इस ब्लॉग में केवल प्रसिद्ध और प्रमाणिक कवियों के करुण रस के उदाहरण दिए गए हैं। प्रत्येक उदाहरण को उसकी आवश्यकता अनुसार पूरी पंक्तियों में लिया गया है और detail explanation दी गई है ताकि आप इसे सीधे exam में लिख सकें।
1. महादेवी वर्मा
“मैं नीर भरी दुख की बदली,
स्पंदन में चिर निस्पंद बसी,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली।”
व्याख्या: इस काव्यांश में कवयित्री ने अपने जीवन को पूर्णतः दुःखमय बताया है। “नीर”, “क्रंदन” और “निर्झरिणी” जैसे शब्द आँसुओं और पीड़ा का प्रतीक हैं। पूरा दृश्य एक ऐसी स्थिति प्रस्तुत करता है जहाँ अंदर ही अंदर दुःख का सागर उमड़ रहा है। यह गहरी भावनात्मक पीड़ा पाठक के मन में करुणा उत्पन्न करती है, इसलिए यहाँ करुण रस है।
2. जयशंकर प्रसाद
“दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज जो नहीं कही,
कहते-कहते रह जाता हूँ।”
व्याख्या: कवि अपने पूरे जीवन को दुःख से भरा हुआ बताता है। उसकी पीड़ा इतनी गहरी है कि वह उसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता। “कहते-कहते रह जाता हूँ” से उसकी असहायता और अंदर का दर्द स्पष्ट होता है। यह स्थिति करुण रस को उत्पन्न करती है।
3. मैथिलीशरण गुप्त
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”
व्याख्या: इस पंक्ति में नारी जीवन की करुण स्थिति को दर्शाया गया है। “आँचल में दूध” उसके ममत्व को दिखाता है, जबकि “आँखों में पानी” उसके दुःख और पीड़ा को प्रकट करता है। यह विरोधाभास नारी के जीवन की दुखद वास्तविकता को सामने लाता है और करुण रस उत्पन्न करता है।
4. सुमित्रानंदन पंत
“वियोगी होगा पहला कवि,
आह से उपजा होगा गान,
निकलकर आँखों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान।”
व्याख्या: यहाँ कवि बताता है कि कविता का जन्म वियोग और पीड़ा से हुआ है। “आह” और “आँखों से बहना” गहरी भावनात्मक वेदना को दर्शाते हैं। वियोग की यह स्थिति पाठक के मन में करुणा उत्पन्न करती है, जिससे करुण रस प्रकट होता है।
5. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
“वह तोड़ती पत्थर,
देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार पेड़,
वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार।”
व्याख्या: इस कविता में एक गरीब मजदूर महिला का चित्रण किया गया है, जो कठोर धूप में पत्थर तोड़ रही है। उसके पास न छाया है, न आराम। यह उसकी गरीबी, कठिन जीवन और असहायता को दर्शाता है। यह दृश्य पाठक के मन में गहरी करुणा उत्पन्न करता है, इसलिए यहाँ करुण रस है।
6. तुलसीदास
“हे नाथ! दीनदयालु कृपाला,
करहु कृपा अब मो पर भाला,
मैं अति दीन, दुःखी, निर्बल।”
व्याख्या: यहाँ भक्त अपनी दीन अवस्था में भगवान से सहायता की प्रार्थना करता है। उसकी असहायता, दुःख और विनम्रता करुण रस को उत्पन्न करती है। “दीन”, “दुःखी” जैसे शब्द करुण भाव को और गहरा बनाते हैं।
7. कबीर
“दुख में सुमिरन सब करें,
सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करे,
तो दुख काहे को होय।”
व्याख्या: कबीर जी यहाँ मनुष्य की प्रवृत्ति को बताते हैं कि वह दुख में ही भगवान को याद करता है। “दुख” की स्थिति करुण रस को जन्म देती है और मनुष्य की असहायता को दर्शाती है।
8. रहीम
“रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।”
व्याख्या: यहाँ टूटे हुए संबंधों का दर्द दिखाया गया है। जब प्रेम का बंधन टूटता है, तो वह पूरी तरह पहले जैसा नहीं हो पाता। यह भावनात्मक पीड़ा करुण रस को उत्पन्न करती है।
9. हरिवंश राय बच्चन
“विपदाएँ आती हैं आती रहें,
हम न रुकेंगे, हम न झुकेंगे,
दुःख से जीवन निखरता है।”
व्याख्या: यहाँ जीवन के दुखों का वर्णन किया गया है। “विपदाएँ” और “दुःख” शब्द करुण भाव को दर्शाते हैं। यद्यपि इसमें साहस भी है, फिर भी मूल भाव दुःख का है, जिससे करुण रस उत्पन्न होता है।
10. सूरदास
“मैया! मोहि दाऊ बहुत खिझायो,
मोसों कहत माखन तू खायो,
मैं तो बालक नन्हा।”
व्याख्या: यहाँ बालक कृष्ण की मासूम शिकायत दिखाई गई है। उसकी असहायता और भोलेपन में करुणा का भाव उत्पन्न होता है। यह हल्का करुण रस है, जिसमें दया और स्नेह दोनों शामिल हैं।
करुण रस के 10 और प्रसिद्ध उदाहरण
11. मैथिलीशरण गुप्त (साकेत)
“राम! तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,
कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है,
सीता के दुःख से द्रवित हृदय रोता है।”
व्याख्या: इस संदर्भ में सीता जी के वनवास और कष्टों का वर्णन किया गया है। उनका वियोग, दुःख और कष्ट पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है। यह स्थिति करुण रस को स्पष्ट रूप से उत्पन्न करती है।
12. रामधारी सिंह ‘दिनकर’
“क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।”
व्याख्या: यहाँ कमजोर और असहाय व्यक्ति की स्थिति को दिखाया गया है। उसकी विवशता और शक्ति की कमी करुण भाव उत्पन्न करती है।
13. जयशंकर प्रसाद (आँसू)
“जो घनीभूत पीड़ा थी,
मस्तक में स्मृति-सी छाई,
दुर्दिन में आँसू बनकर,
वह आज बरसने आई।”
व्याख्या: यहाँ संचित पीड़ा के आँसू बनकर बहने का चित्रण है। “घनीभूत पीड़ा” और “आँसू” शब्द गहरी करुणा उत्पन्न करते हैं।
14. महादेवी वर्मा
“विरह का जलजात जीवन,
विरह का जलजात,
वेदना में जन्म, करुणा में मिला आवास।”
व्याख्या: यहाँ जीवन को विरह और वेदना से उत्पन्न बताया गया है। “वेदना” और “करुणा” शब्द सीधे करुण रस को व्यक्त करते हैं।
15. सुभद्रा कुमारी चौहान
“वीरों का कैसा हो वसंत,
जब हो देश में ऐसी दशा,
रोता है हर एक जन।”
व्याख्या: यहाँ देश की दयनीय स्थिति का वर्णन है। लोगों का रोना और दुःख करुण रस को उत्पन्न करता है।
16. सूरदास
“अखियाँ हरि दर्शन की प्यासी,
देखौं कब हरि रूप मनोहर,
जिय में बड़ी उदासी।”
व्याख्या: भगवान के दर्शन की तीव्र इच्छा और वियोग की पीड़ा दिखाई गई है। “उदासी” और “प्यास” करुण रस उत्पन्न करते हैं।
17. तुलसीदास (रामचरितमानस)
“सुनि सिय दुख प्रभु हृदय अति द्रवाना,
नयन बारी बहि गए न ठिकाना,
करुणा से भर आया मन।”
व्याख्या: सीता जी के दुःख को सुनकर भगवान राम का हृदय द्रवित हो जाता है और उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। यह करुण रस का अत्यंत स्पष्ट उदाहरण है।
18. कबीर
“चलती चाकी देख कर,
दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में,
साबुत बचा न कोय।”
व्याख्या: यहाँ जीवन की कठोर सच्चाई और पीड़ा को चाकी के रूपक से बताया गया है। इसमें मनुष्य की असहायता करुण रस उत्पन्न करती है।
19. निराला
“भिक्षुक आया द्वार,
आँखों में आँसू लिए,
कहता था दुख अपार।”
व्याख्या: यहाँ एक भिक्षुक की दयनीय स्थिति का चित्रण है। उसकी गरीबी और पीड़ा पाठक के मन में करुणा उत्पन्न करती है।
20. प्रसाद
“अरुण यह मधुमय देश हमारा,
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को,
मिलता एक सहारा—
पर दुःख भी यहाँ अपार।”
व्याख्या: यहाँ देश की सुंदरता के साथ-साथ दुःख का भी उल्लेख है। यह विरोधाभास करुण भाव को उत्पन्न करता है।