bhakti kaal ki pramukh dharaon ka parichay dijiye- भक्ति काल की प्रमुख धाराओं का परिचय दीजिए
Bhakti Kaal ki Pramukh Dharaen in Hindi - भक्ति काल की प्रमुख धाराएँ
हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्ति काल एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह काल लगभग 1375 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। इस काल में कवियों ने ईश्वर भक्ति, प्रेम, समाज सुधार और आध्यात्मिकता को अपने काव्य का मुख्य विषय बनाया।
भक्ति काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें भक्ति को कई धाराओं में विभाजित किया गया। इन धाराओं के माध्यम से भक्तों ने ईश्वर के विभिन्न रूपों और भावों को व्यक्त किया।
भक्ति काल की प्रमुख धाराएँ
भक्ति काल को मुख्य रूप से दो बड़ी धाराओं में विभाजित किया जाता है –
- निर्गुण भक्ति धारा
- सगुण भक्ति धारा
इन दोनों धाराओं का विस्तृत वर्णन नीचे दिया गया है।
1. निर्गुण भक्ति धारा
निर्गुण भक्ति धारा क्या है? (Nirgun Bhakti Dhara kise kahate hain)
निर्गुण भक्ति धारा वह भक्ति धारा है जिसमें भगवान को किसी भी रूप, रंग या आकार में नहीं माना जाता। इस धारा के अनुसार भगवान हर जगह मौजूद है और उसे केवल भक्ति, ज्ञान और प्रेम के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।
निर्गुण का अर्थ होता है – जिसमें कोई गुण या रूप न हो। इसलिए इस धारा के भक्त भगवान की मूर्ति या चित्र की पूजा नहीं करते।
निर्गुण भक्ति धारा की परिभाषा
जिस भक्ति में भगवान को निराकार, निर्गुण और सर्वव्यापी माना जाता है तथा मूर्ति पूजा और बाहरी आडंबर का विरोध किया जाता है, उसे निर्गुण भक्ति धारा कहते हैं।
निर्गुण भक्ति धारा की विशेषताएँ
- भगवान को निराकार (बिना रूप) माना जाता है
- मूर्ति पूजा का विरोध किया जाता है
- आडंबर और पाखंड का विरोध किया जाता है
- समानता और मानवता पर जोर दिया जाता है
- भक्ति को सरल और सहज बनाया गया
- जाति-भेद और ऊँच-नीच का विरोध किया गया
निर्गुण भक्ति धारा के प्रकार
निर्गुण भक्ति धारा को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है –
- ज्ञानमार्गी शाखा
- प्रेममार्गी शाखा
1. ज्ञानमार्गी शाखा
इस शाखा में ज्ञान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें कहा गया है कि भगवान को प्राप्त करने के लिए सही ज्ञान जरूरी है।
इस शाखा के प्रमुख कवि हैं – कबीर, दादू दयाल आदि।
2. प्रेममार्गी शाखा
इस शाखा में भगवान को पाने के लिए प्रेम को सबसे बड़ा साधन माना गया है। यह शाखा सूफी विचारधारा से प्रभावित है।
इस शाखा के प्रमुख कवि हैं – मलिक मोहम्मद जायसी।
निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि
- कबीरदास
- रैदास
- दादू दयाल
- मलिक मोहम्मद जायसी
1.कबीरदास
कबीरदास निर्गुण भक्ति धारा के सबसे प्रमुख कवि थे। उन्होंने समाज में फैली बुराइयों, अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया। उनकी भाषा सरल और जनसाधारण के लिए समझने योग्य थी।
2.रैदास
रैदास ने समानता और भक्ति का संदेश दिया। उन्होंने जाति-प्रथा का विरोध किया और कहा कि सभी मनुष्य बराबर हैं।
3.दादू दयाल
दादू दयाल ने प्रेम और भक्ति को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने भी मूर्ति पूजा और आडंबर का विरोध किया।
4.मलिक मोहम्मद जायसी
जायसी प्रेममार्गी शाखा के प्रमुख कवि थे। उन्होंने अपनी रचना पद्मावत के माध्यम से प्रेम और भक्ति का संदेश दिया।
निर्गुण भक्ति धारा के उदाहरण
नीचे कुछ सरल उदाहरण दिए गए हैं जो परीक्षा में लिखने के लिए उपयोगी हैं –
- "मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में" – कबीर
- "मन चंगा तो कठौती में गंगा" – रैदास
- "दादू ऐसा हरि से लागे" – दादू दयाल
निर्गुण भक्ति धारा का महत्व
- समाज में समानता का संदेश दिया
- जाति-भेद को खत्म करने का प्रयास किया
- भक्ति को सरल बनाया
- अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया
- मानवता और प्रेम को बढ़ावा दिया
निर्गुण भक्ति धारा और सगुण भक्ति धारा में अंतर
| निर्गुण भक्ति धारा | सगुण भक्ति धारा |
|---|---|
| भगवान निराकार होते हैं | भगवान साकार होते हैं |
| मूर्ति पूजा का विरोध | मूर्ति पूजा का समर्थन |
| ज्ञान और प्रेम पर जोर | भक्ति और भजन पर जोर |
| कबीर, रैदास प्रमुख कवि | तुलसीदास, सूरदास प्रमुख कवि |
2. सगुण भक्ति धारा
सगुण भक्ति धारा में भगवान को रूप, गुण और आकार के साथ माना जाता है। इस धारा के अनुसार ईश्वर को देखा, समझा और पूजा जा सकता है।
इस धारा में राम और कृष्ण जैसे अवतारों की भक्ति प्रमुख रूप से की गई।
सगुण भक्ति धारा की विशेषताएँ
- भगवान को साकार रूप में मानना
- मूर्ति पूजा को स्वीकार करना
- भक्ति में प्रेम और भाव का महत्व
- काव्य में सुंदरता और रस का समावेश
सगुण भक्ति धारा के उपविभाग
सगुण भक्ति धारा को दो भागों में विभाजित किया गया है –
- राम भक्ति शाखा
- कृष्ण भक्ति शाखा
1. राम भक्ति शाखा
इस शाखा में भगवान राम की भक्ति को प्रमुखता दी गई। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया गया।
तुलसीदास इस शाखा के प्रमुख कवि हैं। उनकी रचना रामचरितमानस अत्यंत प्रसिद्ध है।
2. कृष्ण भक्ति शाखा
इस शाखा में भगवान कृष्ण की भक्ति की गई। कृष्ण को प्रेम, लीला और आनंद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
सूरदास और मीराबाई इस शाखा के प्रमुख कवि हैं।
भक्ति काल की धाराओं का महत्व
भक्ति काल की विभिन्न धाराओं का हिंदी साहित्य और समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा।
- इन धाराओं ने भक्ति को सरल और जनसुलभ बनाया
- समाज में समानता और प्रेम का संदेश दिया
- धर्म के नाम पर फैली बुराइयों का विरोध किया
- साहित्य को नई दिशा प्रदान की
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- भक्ति काल दो मुख्य धाराओं में विभाजित है – सगुण और निर्गुण
- निर्गुण भक्ति = निराकार ईश्वर
- सगुण भक्ति = साकार ईश्वर
- राम और कृष्ण भक्ति सगुण धारा में आती हैं
- कबीर = निर्गुण भक्ति
- तुलसीदास = राम भक्ति
- सूरदास = कृष्ण भक्ति