मंदाक्रांता छंद | Mandakranta Chhand ke 10 Udaharan

Arpit Nageshwar
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मंदाक्रांता छंद संस्कृत काव्य का एक प्रसिद्ध वर्णिक छंद है। महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध काव्य ‘मेघदूत’ की रचना इसी छंद में की है। इसकी लय गंभीर, मधुर और भावपूर्ण होती है। विशेष रूप से विरह और प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करने में इसका प्रभावशाली प्रयोग मिलता है। इस लेख में मंदाक्रांता छंद की परिभाषा, लक्षण, गण-विन्यास, यति और प्रमाणिक उदाहरण सरल हिंदी में समझेंगे।

Mandakranta Chhand Kya Hai – मंदाक्रांता छंद क्या है?

मंदाक्रांता एक वर्णिक छंद है, जिसमें प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। इसमें लघु और गुरु वर्णों का क्रम निश्चित रहता है। इस छंद में चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में समान वर्ण-क्रम का पालन किया जाता है।

महाकवि कालिदास का ‘मेघदूत’ इस छंद का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसमें विरह से दुखी यक्ष अपने संदेश को मेघ के माध्यम से अपनी प्रिय पत्नी तक पहुँचाना चाहता है। इस काव्य की भावपूर्ण भाषा और मंदाक्रांता की लय एक-दूसरे के अनुकूल हैं।

मंदाक्रांता छंद प्रत्येक चरण में 17 वर्ण गण-विन्यास लघु-गुरु क्रम यति म, भ, न, त, त, ग, ग

Mandakranta Ka Arth – मंदाक्रांता का अर्थ

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‘मंदाक्रांता’ संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका सामान्य अर्थ धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाली गति से जुड़ा है। इस छंद की लय में एक विशेष ठहराव और प्रवाह दिखाई देता है, इसलिए इसका नाम इसकी गति की विशेषता को प्रकट करता है।

  • मंद: धीरे या धीमी गति से।
  • आक्रांता: आगे बढ़ने या गति करने से संबंधित।

इस प्रकार मंदाक्रांता नाम से धीमी गति और लय का भाव प्रकट होता है। हालाँकि छंद की पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके निश्चित वर्ण-क्रम और गण-विन्यास से होती है।

Mandakranta Chhand Ki Paribhasha – मंदाक्रांता छंद की परिभाषा

जिस वर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में 17 वर्ण हों तथा जिसमें मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और अंत में दो गुरु वर्णों का निश्चित क्रम हो, उसे मंदाक्रांता छंद कहते हैं।

इस छंद का गण-विन्यास म, भ, न, त, त, ग, ग होता है। इसमें यति का क्रम चार, छह और सात वर्णों के समूहों के अनुसार समझा जाता है। अर्थात् चरण में चौथे वर्ण के बाद, फिर छह वर्णों के बाद और अंत में शेष सात वर्णों के बाद विराम का स्थान आता है।

Mandakranta Chhand Ke Lakshan – मंदाक्रांता छंद के लक्षण

मंदाक्रांता छंद की पहचान उसके वर्णों की संख्या, गुरु-लघु क्रम और गण-विन्यास से होती है। इसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:

  1. छंद का प्रकार: मंदाक्रांता एक वर्णिक छंद है। इसमें वर्णों की संख्या और उनका क्रम निश्चित रहता है।
  2. वर्णों की संख्या: इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। चार चरणों वाले एक श्लोक में कुल 68 वर्ण होते हैं।
  3. गण-विन्यास: प्रत्येक चरण में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु वर्ण आते हैं।
  4. गुरु-लघु क्रम: इसमें गुरु और लघु वर्णों का निश्चित क्रम होता है। इसी क्रम से छंद की पहचान की जाती है।
  5. यति: इसमें चौथे वर्ण के बाद, फिर छह वर्णों के बाद और शेष सात वर्णों के बाद विराम का विधान माना जाता है।
  6. प्रसिद्ध रचना: कालिदास का ‘मेघदूत’ मंदाक्रांता छंद में रचित प्रसिद्ध काव्य है।

Mandakranta Chhand Ka Gan Vinyas – मंदाक्रांता छंद का गण-विन्यास

मंदाक्रांता छंद में सात खंडों का निश्चित क्रम होता है। पहले पाँच खंड तीन-तीन वर्णों के गण हैं और अंतिम दो वर्ण गुरु होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चरण में कुल 17 वर्ण पूरे होते हैं।

क्रमगण या वर्णलक्षण
1मगण (म)गुरु, गुरु, गुरु
2भगण (भ)गुरु, लघु, लघु
3नगण (न)लघु, लघु, लघु
4तगण (त)गुरु, गुरु, लघु
5तगण (त)गुरु, गुरु, लघु
6गुरु (ग)एक गुरु वर्ण
7गुरु (ग)एक गुरु वर्ण

गण क्रम: म – भ – न – त – त – ग – ग

मंदाक्रांता का गण क्रम मऽऽऽ भऽ।। न।।। तऽऽ। तऽऽ। गऽ गऽ 3 + 3 + 3 + 3 + 3 + 1 + 1 = 17 वर्ण गुरु = ऽ लघु = । गणों का क्रम प्रत्येक चरण में समान रहता है।

ध्यान दें: ऊपर गुरु और लघु के चिह्न समझाने के लिए दिए गए हैं। संस्कृत छंदशास्त्र में वर्ण की गुरु-लघु पहचान उच्चारण और वर्ण की संरचना के अनुसार की जाती है।

Mandakranta Chhand Ki Visheshtayein – मंदाक्रांता छंद की विशेषताएँ

  1. निश्चित वर्ण-क्रम: प्रत्येक चरण में 17 वर्ण और निश्चित गुरु-लघु क्रम होता है।
  2. मधुर लय: इसके वर्णों का क्रम पाठ में एक विशिष्ट लय और प्रवाह उत्पन्न करता है।
  3. विरह का प्रभाव: इसका प्रसिद्ध प्रयोग विरह और प्रिय से दूर रहने की भावनाओं को व्यक्त करने वाले काव्य में मिलता है।
  4. संस्कृत साहित्य में स्थान: कालिदास के ‘मेघदूत’ के कारण यह छंद विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
  5. चार चरण: एक पूर्ण श्लोक में चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में समान वर्ण-विन्यास रहता है।

Mandakranta Chhand Ke 10 Udaharan – मंदाक्रांता छंद के 10 उदाहरण

महाकवि कालिदास के ‘मेघदूत’ में मंदाक्रांता छंद का प्रसिद्ध प्रयोग मिलता है। नीचे इसके दस मूल श्लोक और उनके सरल हिंदी भावार्थ दिए गए हैं।

Udaharan 1 – उदाहरण 1

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 1

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः।
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः॥
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु।
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु॥

भावार्थ: अपनी प्रिय पत्नी से बिछुड़ने के दुख से पीड़ित एक यक्ष को उसके स्वामी कुबेर ने एक वर्ष का शाप दिया। वह रामगिरि के आश्रमों में रहने लगा, जहाँ घने छायादार वृक्ष और पवित्र जल वाले सरोवर थे।

Udaharan 2 – उदाहरण 2

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 2

तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबलाविप्रयुक्तः स कामी।
नीत्वा मासान्कनकवलयभ्रंशरिक्तप्रकोष्ठः॥
आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं।
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श॥

भावार्थ: अपनी प्रिय से दूर रहकर कई महीने बिताने के बाद यक्ष बहुत दुबला हो गया था। आषाढ़ मास के पहले दिन उसने पर्वत की चोटी से लिपटे हुए एक सुंदर मेघ को देखा।

Udaharan 3 – उदाहरण 3

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 3

तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतोः।
अन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ॥
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्ति चेतः।
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे॥

भावार्थ: मेघ को देखकर यक्ष की आँखों में आँसू भर आए और वह देर तक सोचता रहा। जब मेघ को देखकर सुखी व्यक्ति का मन भी बदल जाता है, तब उस व्यक्ति की स्थिति कैसी होगी जिसकी प्रिय उससे बहुत दूर हो।

Udaharan 4 – उदाहरण 4

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 4

प्रत्यासन्ने नभसि दयिताजीवितालम्बनार्थी।
जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन्प्रवृत्तिम्॥
स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै।
प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार॥

भावार्थ: वर्षा ऋतु निकट आने पर यक्ष ने मेघ के माध्यम से अपनी कुशलता का समाचार प्रिय पत्नी तक पहुँचाने का निश्चय किया। उसने ताजे कुटज पुष्पों से मेघ का सम्मान किया और प्रेमपूर्वक उसका स्वागत किया।

Udaharan 5 – उदाहरण 5

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 5

धूमज्योतिःसलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः।
सन्देशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः॥
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन्गुह्यकस्तं ययाचे।
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु॥

भावार्थ: यक्ष सोचता है कि धुएँ, प्रकाश, जल और वायु से बना मेघ कहाँ और संदेश पहुँचाने में समर्थ चेतन प्राणी कहाँ। फिर भी प्रेम और विरह से व्याकुल होकर वह मेघ से अपनी प्रार्थना करता है।

Udaharan 6 – उदाहरण 6

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 6

जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां।
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः॥
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दूरबन्धुर्गतोऽहं।
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा॥

भावार्थ: यक्ष मेघ की प्रशंसा करते हुए कहता है कि वह प्रसिद्ध मेघ-वंश में उत्पन्न हुआ है और इंद्र का प्रिय है। वह कहता है कि गुणी व्यक्ति से की गई असफल प्रार्थना भी किसी अयोग्य व्यक्ति से सफल प्रार्थना करने से बेहतर है।

Udaharan 7 – उदाहरण 7

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 7

सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियायाः।
सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य॥
गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां।
बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या॥

भावार्थ: यक्ष मेघ से अपनी प्रिय पत्नी तक संदेश पहुँचाने की प्रार्थना करता है। वह मेघ को अलका नगरी जाने के लिए कहता है, जहाँ यक्षों के स्वामी कुबेर का निवास है और महल चंद्रमा की चाँदनी से प्रकाशित रहते हैं।

Udaharan 8 – उदाहरण 8

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 8

त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ताः।
प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसत्यः॥
कः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायां।
न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः॥

भावार्थ: मेघ को आकाश में देखकर यात्रियों की पत्नियों को अपने पतियों के लौटने की आशा होगी। यक्ष कहता है कि अपनी विरह से दुखी पत्नी की उपेक्षा कोई नहीं करेगा, लेकिन वह स्वयं शाप के कारण विवश है।

Udaharan 9 – उदाहरण 9

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 9

मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां।
वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः॥
गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्धमालाः।
सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः॥

भावार्थ: अनुकूल हवा मेघ को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रही है और चातक पक्षी मधुर स्वर में बोल रहा है। आकाश में पंक्तिबद्ध उड़ती हुई बगुलों की पंक्तियाँ मेघ की सुंदरता को और बढ़ा रही हैं।

Udaharan 10 – उदाहरण 10

मूल श्लोक — मेघदूत, पूर्वमेघ 10

तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नीम्।
अव्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम्॥
आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां।
सद्यः पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥

भावार्थ: यक्ष कहता है कि मेघ उसकी पत्नी को अवश्य देखेगा, जो पति के लौटने के दिनों की गिनती कर रही होगी। विरह के समय मिलने की आशा ही प्रेम से भरे कोमल हृदय को टूटने से बचाती है।

Mandakranta Chhand Ki Pahchan Kaise Karein – मंदाक्रांता छंद की पहचान कैसे करें?

किसी पंक्ति या चरण को मंदाक्रांता छंद का उदाहरण मानने से पहले उसके वर्णों और गुरु-लघु क्रम की जाँच करनी चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित चरण अपनाएँ:

  1. वर्ण गिनें: पहले चरण में कुल 17 वर्ण होने चाहिए।
  2. गण बनाएँ: वर्णों को तीन-तीन के समूहों में बाँटकर गणों की पहचान करें।
  3. क्रम मिलाएँ: गणों का क्रम म, भ, न, त, त और अंत में दो गुरु वर्ण होना चाहिए।
  4. यति जाँचें: चार, छह और सात वर्णों के क्रम के अनुसार विराम-स्थानों की जाँच करें।
  5. चारों चरण देखें: पूरे श्लोक के सभी चरणों में निर्धारित छंद-विन्यास होना चाहिए।

Mandakranta Chhand Ke Mahatvapurn Bindu – मंदाक्रांता छंद के महत्त्वपूर्ण बिंदु

  1. छंद का प्रकार: वर्णिक छंद।
  2. प्रत्येक चरण में वर्ण: 17।
  3. एक श्लोक में कुल वर्ण: 68।
  4. गण-विन्यास: म, भ, न, त, त, ग, ग।
  5. प्रमुख रचनाकार: महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ में इसका प्रसिद्ध प्रयोग किया है।
  6. प्रमुख भाव: विरह और प्रेम से जुड़े भावों की अभिव्यक्ति में इसका प्रभावशाली प्रयोग मिलता है।

Mandakranta Chhand Ke Prashn-Uttar – मंदाक्रांता छंद के प्रश्न-उत्तर

मंदाक्रांता एक वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं और गुरु-लघु का निश्चित क्रम रहता है।

जिस वर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में 17 वर्ण तथा म, भ, न, त, त, ग, ग का निश्चित क्रम होता है, उसे मंदाक्रांता छंद कहते हैं।

मंदाक्रांता छंद के प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। चार चरणों वाले एक श्लोक में कुल 68 वर्ण होते हैं।

इसका गण-विन्यास मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और अंत में दो गुरु वर्ण है। इसे संक्षेप में म, भ, न, त, त, ग, ग लिखा जाता है।

महाकवि कालिदास का ‘मेघदूत’ मंदाक्रांता छंद का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसकी रचना में विरह और प्रेम की भावनाओं का सुंदर चित्रण मिलता है।

इसकी पहचान के लिए प्रत्येक चरण में 17 वर्ण गिनें और म, भ, न, त, त, ग, ग के गुरु-लघु क्रम की जाँच करें। केवल वर्णों की संख्या मिलना पर्याप्त नहीं है।

इसकी मुख्य विशेषताएँ निश्चित वर्ण-क्रम, गुरु-लघु का विधान, मधुर लय और भावपूर्ण प्रवाह हैं। इसका प्रसिद्ध प्रयोग कालिदास के ‘मेघदूत’ में मिलता है।

मंदाक्रांता छंद का प्रयोग संस्कृत साहित्य में प्रसिद्ध है। महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ में इसका अत्यंत प्रसिद्ध प्रयोग किया है। इसलिए उन्हें इस छंद से विशेष रूप से जोड़ा जाता है।

Arpit Nageshwar

✍️ Arpit Nageshwar

Post-graduated | Web Developer | +3 yr Experience

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