उच्चारण के आधार पर वर्ण के भेद

Arpit Nageshwar
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उच्चारण के आधार पर वर्ण के भेद

हिंदी में हर वर्ण मुँह के किसी न किसी हिस्से से निकलता है — कहीं गले से, कहीं जीभ से, कहीं होंठों से। यही जगह और तरीका तय करता है कि वर्ण को किस श्रेणी में रखा जाए। इसी वर्गीकरण को "उच्चारण के आधार पर वर्ण के भेद" कहा जाता है, और यही टॉपिक हिंदी व्याकरण की नींव है। इसे एक बार सही तरीके से समझ लेने पर वर्तनी की गलतियाँ अपने-आप कम हो जाती हैं और वर्णों से जुड़ा कोई भी सवाल आसान लगने लगता है।

वर्ण किसे कहते हैं?

भाषा की सबसे छोटी और अविभाज्य ध्वनि इकाई को वर्ण कहते हैं। जब हम बोलते हैं तो शब्द बनते हैं, शब्द इकाइयों से बनते हैं, और वे इकाइयाँ ही वर्ण हैं। जैसे "घर" शब्द तीन वर्णों — घ, अ, र — से बना है। हर वर्ण की अपनी एक निश्चित ध्वनि होती है, और उसी ध्वनि के आधार पर उसकी पहचान और वर्गीकरण किया जाता है।

वर्णों का वर्गीकरण

सबसे पहले वर्णों को दो बड़े भागों में बाँटा जाता है:

  • स्वर — वे वर्ण जिन्हें बोलने में किसी अंग की सहायता नहीं लेनी पड़ती, हवा बिना रुके सीधे बाहर निकल जाती है। जैसे: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।
  • व्यंजन — वे वर्ण जिन्हें बोलने में स्वर की सहायता लेनी पड़ती है और हवा कहीं न कहीं रुककर निकलती है। जैसे: क, ख, ग, च, ट, त, प आदि।

यहाँ तक तो सामान्य वर्गीकरण है, लेकिन असली बात तब शुरू होती है जब हम पूछते हैं — ये वर्ण निकलते कहाँ से हैं? इसी सवाल का जवाब है उच्चारण-स्थान आधारित वर्गीकरण।

उच्चारण स्थान क्या होता है?

मुँह के अंदर जिस जगह से टकराकर या रुककर कोई वर्ण अपनी ध्वनि बनाता है, उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते हैं। इसमें मुख्य रूप से पाँच अंग काम करते हैं — कंठ (गला), तालु, मूर्धा, दाँत और होंठ। हर वर्ण इन्हीं में से किसी एक या दो अंगों की सहायता से बोला जाता है, और इसी आधार पर उसका नाम भी रखा गया है।

उच्चारण स्थान के आधार पर वर्णों के भेद

अब मुख्य बात पर आते हैं — किस अंग से कौन-सा वर्ण निकलता है, यह जानना ही इस टॉपिक का सार है।

1. कंठ्य वर्ण

जो वर्ण सीधे गले (कंठ) से निकलते हैं, उन्हें कंठ्य कहा जाता है। बोलते समय जीभ का पिछला हिस्सा गले के ऊपरी भाग (कोमल तालु) को छूता है।

कंठ्य वर्ण हैं: क, ख, ग, घ, ङ (और स्वर अ, आ भी कंठ से ही निकलते हैं तथा विसर्ग "ः" को भी कंठ्य माना जाता है)।

2. तालव्य वर्ण

जब जीभ का बीच का हिस्सा तालु (मुँह की ऊपरी छत के अगले भाग) से टकराता है, तो जो ध्वनि बनती है उसे तालव्य कहते हैं।

तालव्य वर्ण हैं: च, छ, ज, झ, ञ, तथा य और श भी इसी वर्ग में आते हैं। स्वर इ, ई का उच्चारण-स्थान भी तालु ही है।

3. मूर्धन्य वर्ण

जीभ की नोक जब मुड़कर तालु के पीछे वाले, ऊँचे उठे हुए भाग (मूर्धा) को छूती है, तो जो वर्ण बनते हैं उन्हें मूर्धन्य कहा जाता है। इन वर्णों को बोलते समय जीभ थोड़ी पीछे और ऊपर की ओर मुड़ती है, इसलिए इनकी ध्वनि बाकी वर्णों से थोड़ी भारी और टकराव वाली सुनाई देती है।

मूर्धन्य वर्ण हैं: ट, ठ, ड, ढ, ण, तथा र और ष भी मूर्धा से ही बोले जाते हैं। एक आसान पहचान यह है कि "ट-वर्ग" के सभी पाँच वर्ण मूर्धन्य ही होते हैं।

4. दंत्य वर्ण

जब जीभ का अगला हिस्सा ऊपरी दाँतों की जड़ को छूता है, तो जो वर्ण बनते हैं वे दंत्य कहलाते हैं।

दंत्य वर्ण हैं: त, थ, द, ध, न, तथा ल और स भी दंत्य वर्ग में आते हैं।

5. ओष्ठ्य वर्ण

जो वर्ण दोनों होंठों को आपस में मिलाकर बोले जाते हैं, उन्हें ओष्ठ्य कहा जाता है।

ओष्ठ्य वर्ण हैं: प, फ, ब, भ, म, तथा स्वर उ, ऊ भी होंठ गोल करके बोले जाते हैं।

6. दंतोष्ठ्य वर्ण

एक वर्ण ऐसा भी है जिसमें दाँत और होंठ दोनों का उपयोग होता है — यह है । इसे बोलते समय निचला होंठ ऊपरी दाँतों को हल्के से छूता है, इसलिए इसे दंतोष्ठ्य कहा जाता है।

उच्चारण-स्थान के अनुसार वर्ण — सार तालिका

उच्चारण स्थान अंग वर्ण
कंठ्य कंठ (गला) क, ख, ग, घ, ङ, अ, आ, ः
तालव्य तालु च, छ, ज, झ, ञ, य, श, इ, ई
मूर्धन्य मूर्धा ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष
दंत्य दाँत त, थ, द, ध, न, ल, स
ओष्ठ्य होंठ प, फ, ब, भ, म, उ, ऊ
दंतोष्ठ्य दाँत + होंठ

वर्ग का उच्चारण किसे कहते हैं?

ध्यान दें कि क, ख, ग, घ, ङ — यह पूरा समूह एक ही जगह यानी कंठ से निकलता है। इसी वजह से इन पाँच वर्णों को मिलाकर "क वर्ग" कहा जाता है। इसी तरह हर उच्चारण-स्थान का अपना एक वर्ग बनता है:

  • क वर्ग — क, ख, ग, घ, ङ (कंठ से)
  • च वर्ग — च, छ, ज, झ, ञ (तालु से)
  • ट वर्ग — ट, ठ, ड, ढ, ण (मूर्धा से)
  • त वर्ग — त, थ, द, ध, न (दाँत से)
  • प वर्ग — प, फ, ब, भ, म (होंठ से)

यानी "वर्ग का उच्चारण" समझने का सीधा तरीका यही है — एक ही उच्चारण-स्थान से निकलने वाले पाँच वर्णों का समूह एक वर्ग है।

अर्ध स्वर किसे कहते हैं?

चार वर्ण ऐसे हैं जो व्यंजन तो होते हैं, पर उनकी ध्वनि स्वर जैसी मुलायम भी होती है — यानी बोलते समय हवा पूरी तरह न तो रुकती है, न पूरी तरह खुली रहती है। इन्हें अर्ध-स्वर या अंतःस्थ कहा जाता है।

अर्ध-स्वर हैं: य, र, ल, व। इनका उच्चारण-स्थान क्रमशः तालु, मूर्धा, दाँत और दंतोष्ठ्य है।

ऊष्म वर्ण किसे कहते हैं?

जिन वर्णों को बोलते समय हवा घर्षण (रगड़) के साथ तेज़ी से बाहर निकलती है और एक फुसफुसाहट जैसी आवाज़ बनती है, उन्हें ऊष्म या संघर्षी वर्ण कहा जाता है।

ऊष्म वर्ण हैं: श, ष, स, ह। इनमें श तालव्य, ष मूर्धन्य, स दंत्य और ह कंठ्य है।

अल्पप्राण और महाप्राण वर्ण

उच्चारण-स्थान के अलावा एक और आधार है — बोलते समय हवा कितनी मात्रा में बाहर निकलती है।

  • अल्पप्राण — जिनमें हवा कम मात्रा में निकलती है। जैसे: क, ग, च, ज, ट, ड, त, द, प, ब।
  • महाप्राण — जिनमें हवा अधिक मात्रा में झटके के साथ निकलती है। जैसे: ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ।

अनुनासिक वर्ण

जिन वर्णों को बोलते समय आवाज़ का कुछ हिस्सा नाक से भी निकलता है, वे अनुनासिक कहलाते हैं। हर वर्ग का पाँचवाँ वर्ण अनुनासिक होता है — ङ, ञ, ण, न, म। ये वर्ण भाषा को एक सहज मिठास और गूँज देते हैं, जैसे अंग, गंगा, चंदन जैसे शब्दों में महसूस होता है।

मात्रा और उच्चारण की अवधि

स्वरों को बोलने में लगने वाला समय भी उच्चारण का एक हिस्सा है। इ, उ जैसे स्वर बहुत जल्दी बोले जाते हैं इसलिए इन्हें ह्रस्व कहा जाता है, जबकि ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ बोलने में थोड़ा अधिक समय लगता है इसलिए इन्हें दीर्घ कहा जाता है। यही फर्क शब्द का सही अर्थ बनाए रखने में मदद करता है — जैसे "किल" और "कील" में मात्रा की अवधि ही पूरा अर्थ बदल देती है।

निष्कर्ष

उच्चारण के आधार पर वर्णों को समझने का सीधा तरीका यही है — पहले देखें वर्ण कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत या होंठ में से किससे निकल रहा है, फिर देखें उसमें हवा कितनी और कैसे निकल रही है। इतना समझ लेने के बाद स्वर, व्यंजन, अर्ध-स्वर, ऊष्म और अनुनासिक — सभी वर्ग अपने-आप स्पष्ट हो जाते हैं, और वर्णों से जुड़ा कोई भी सवाल चाहे वह लिखित परीक्षा में हो या रोज़मर्रा की हिंदी में, आसानी से हल हो जाता है।

Arpit Nageshwar

✍️ Arpit Nageshwar

Post-graduated | Web Developer | +3 yr Experience